आखिर क्यों है प्लाज्मा थेरोपी इतनी कारगर, क्या अब प्लाज्मा थेरोपी ही है कोरोना का एक मात्र इलाज ?

प्लाज्मा होता क्या है,  और प्लेटलेट्स क्या हैं ?

प्लाज्मा खून मे मौजूद पीले रंग का तरल होता है। यह बहुत  हद तक पानी और प्रोटीन से बना होता है, और यह रेड ब्लड सेल्स , वाइट  ब्लड  सेल्स  और प्लेटलेट्स को शरीर के अंदर  प्रवाहित  करने के लिए एक रास्ता  प्रदान करता है। रेड ब्लड सेल, वाइट ब्लड सेल और प्लेट्लेट्स आदि को अलग करने के बाद प्लाज्मा ही बचता है ।

प्लेटलेट्स, जिसे थ्रोम्बोसाइट्स /Thrombocytes भी कहा जाता है, रक्त कोशिकाएं हैं जो रक्त के थक्कों और अन्य आवश्यक उपचार करने का काम करती है । प्लेटलेट शरीर की प्राकृतिक चिकित्सा प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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प्लाज्मा में ऐसा क्या चमत्कारिक गुण है?


प्लाज्मा  को आप शरीर के अंदर एक पॉवरफुल प्रभाव कह सकते हो , जो virus को शरीर में मार गिरता  है । यह सभी प्रकार के वायरसों के खिलाफ एक एंटीबॉडी तैयार करता है और फिर वायरस को  खत्म करने का काम शुरू कर देता है।

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प्लाज़्मा शरीर के अंदर  खून में तैयार होता है इस प्रकार के प्लाज़्मा से हमे  एक से दो लोगो  को ठीक  करने में मदद मिलती है । किसी  वायरस के खिलाफ  शरीर में एंटी बॉडी तभी बनता है, जब वह व्यक्ति किसी सम्बंधित वायरस से पीड़ित हो. मान  लीजिये की कोई व्यक्ति कोरोना की बीमारी से ठीक हो जाता है तो उसके शरीर में कोरोना वायरस COVID-19  के खिलाफ एक एन्टीबॉडी बन जाता है .

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इस एंटीबाडी को अन्य कोरोना से संक्रमित  व्यक्ति  की बॉडी में ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है. यह एंटीबाडी  मरीज के शरीर में प्रभावी ढंग से काम करता और मरीज के ठीक होने की सम्भावना को बढ़ाता है है।

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कोरोना से ठीक होकर देश की युवा लड़की ने की प्लाज़्मा दान करने की पहल

इस समय देश के हर कोने में कोरोना वायरस का कहर जारी है . वहीं दूसरी तरफ एक 21 साल की प्रगति चुग   ने अपना प्लाज्मा डोनेट कर समाज में एक नया उदाहरण पेश किया है. प्रगति चुग ने बताया कि वह चीन  से पंजाब लौटजार आई , फिर  कुछ दिन के बाद उनकी तबीयत खराब होने लगी.  डॉक्टर ने सारे टेस्ट किये और शुरुआती जांच के बाद उनका टेस्ट कोरोना वायरस पॉजिटिव आया. उसके बाद प्रगति चुग हॉस्पिटल में एडमिट हो गई. वहीं दूसरी तरफ प्रगति  की पूरी फैमिली को क्वारंटान किया गया. फिलहाल प्रगति चुग पूरी तरह से ठीक हैं और वह अपना अनुभव शेयर करते हुए बताती हैं कि हॉस्पिटल में 14 दिन रहने के बाद मुझे छुट्टी मिली और मैं घर आ गई. घर आने के बाद मुझे डॉक्टर का फोन आया और उन्होंने मुझे ‘प्लाज्मा थेरेपी’ के बारे में समझाया. डॉक्टर ने मुझे बताया कि इस थेरेपी में बिल्कुल दर्द नहीं होता. मुझे डॉक्टर की यह बात सुनकर काफी पॉजिटिव फील हुआ और उसके बाद ही मैंने सोचा मुझे भी अपना प्लाज्मा डोनेट करके ऐसे मरीजों की मदद करनी चाहिए, जिनकी इस बीमारी से जान चली जाती है.

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